सीखें : 21 दिवसीय योगाभ्यास

खाने से पहले 

  • एक ग्लास पानी 
  • छोटी प्लेट 
  • छोटी चम्मच 
  • धीरे धीरे खाना 

व्यायाम 

  • दौड़ना, रोप, साइकलिंग, स्किपिंग
  • रोजाना 6 घंटे की नींद

नहीं खाना है

  • मैदा 
  • चीनी 
  • पैकेट का खाना 
  • बाहर की तली भुनी चीजें

क्या खाना है 

  • मूंग दल चीला 
  • दोसा 
  • उत्तपम 
  • दूध 
  • दही लस्सी 
  • बॉइल अंडे 
  • जूस 
  • चीकू 
  • तव पराठा 
  • जीरा राइस 
  • बिरियानी 
  • हर्रा कबाब 
  • पनीर टिक्का 
  • देसी घी, बटर, ऑलिव ऑइल में बना होना चाहिए 
  • सलाद खाना है 
  • रोटी सब्जी (बिना घी)
  • इडली 
  • उपमा
  • पोहा 
  • ढोकला 
  • आमलेट 
  1. Interpersonal : यम (संयम)

    1. अहिंसा : अहिंसा का अर्थ है किसी प्राणी को मानसिक और शारीरिक : मन, वचन तथा कर्म से कष्ट न देना, ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे किसी प्राणी को दुःख न पहुँचे।
    2. सत्य : जैसा देखा, सुना तथा जाना हो, वैसा ही शुद्ध भाव मन में हो।
    3. अस्तेय : चोरी न करना। दूसरों की वस्तु पर बिना पूछे अधिकार करना अथवा शास्त्रविरुद्ध ढंग से वस्तुओं का ग्रहण न करना । दूसरों की वस्तु को प्राप्त करने की मन में लालसा भी चोरी है।
    4. ब्रह्मचर्य : समस्त इन्द्रियों आँख, कान, नाक, त्वचा एवं रसना को सदा शुभ की ओर प्रेरित करना चाहिए तथा मन में सदा भद्र, सुविचार, शिव-संकल्प रखना।
    5. अपरिग्रह : परिग्रह का अर्थ : अधिक संग्रह करने का प्रयत्न। इसके विपरीत जीवन जीने के लिए न्यूनतम, धन, वस्त्र आदि पदार्थों एवं मकान से सन्तुष्ट होकर जीवन के मुख्य लक्ष्य को प्राप्त करना।
  2. Intrapersonal : नियम (पालन)

    1. शौच : मन, वाणी और शरीर से विकार और अपवित्रता को बाहर निकालना
      • जलनेति : जिनको कफ की समस्या है उन्हें करना चाहिए, नमक को शरीर स्वीकार नहीं करता इसलिए उपयोग करते हैं।
      • कपाल रंध्रधौती (रंध्रधोना)
      • कर्ण रंध्रधौती 
      • कपालभाति (चमक)
    2. सन्तोष : संतुष्टि, स्वीकृति, किसी की परिस्थितियों को वैसे ही स्वीकार करना जैसे वे हैं अतीत पाने या उन्हें बदलने के लिए, स्वयं के लिए आशावाद
    3. तप : सद्-उद्देश्य की सिद्धि में जो भी कष्ट, बाधाएँ, प्रतिकूलताएँ सहज स्वीकार करते हुए, निरन्तर, बिना विचलित हुए, अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना।
    4. स्वाध्याय : वेदों का अध्ययन, स्वयं का अध्ययन, आत्म-चिंतन, स्वयं के विचारों, वाणी और कार्यों का आत्मनिरीक्षण
    5. ईश्वर-प्रणिधान : परम तत्व पर विस्वास, परमात्मा, ब्रह्म , सच्चा स्व, अपरिवर्तनीय वास्तविकता का चिंतन
  3. आसन (योग मुद्राएं) और रिदम 3:6:3

    1. एकपाद आसान : रिदम का उपयोग नहीं 
    2. तालासन : 1,2 
    3. उत्कटासन 
    4. कोणासन : 1,2 
    5. पर्वतासन
    6. कोणासन : 3 
    7. त्रिकोणासन 
    8. चक्रासन 
    9. योगमुद्रा
    10.  Reflexion : रात को सोने से पहले अपने पूरे दिन की क्रियाकलापों का विचार करना और पाज़िटिव निगेटिव सोचना
  4. प्राणायाम (प्राण+आयाम)=प्राणों का दायरा बढ़ाने का कार्य

    1. योगेंद्र प्राणायाम नं 1 (YP-I) : Equal Breathing
    2. योगेंद्र प्राणायाम नं 2 (YP-II) : Intercoastal Breathing
    3. योगेंद्र प्राणायाम नं 3 (YP-III) : Clavicular Breathing
    4. योगेंद्र प्राणायाम नं 4 (YP-IV) : Diaphragmatic (Abdomnal) Breathing
    5. नाड़ी : ईड़ा, पिंगला, सुषुम्ना

      72,000 नाड़ियां में तीन मुख्य नाड़ियों- बाईं, दाहिनी और मध्य यानी इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना से निकलती हैं। अगर आप शरीर को काट कर इन्हें देखने की कोशिश करें तो आप उन्हें नहीं खोज सकते। प्राण या ऊर्जा 72,000 अलग-अलग रास्तों से होकर गुजरती है। नाडियाँ शरीर में स्थित नाड़ी चक्रों को जोड़तीं है। योग ग्रंथ 10 नाड़ियों को प्रमुख मानते हैं। इनमें भी 3 का उल्लेख बार-बार मिलता है – ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना

      1. ईड़ा – चंद्रनाड़ी, शरीर के बाईं ओर चढ़ता है, पहले छह चक्रों को छूता है और बायीं नासिका में समाप्त होता है। प्राण ऊर्जा एक नकारात्मक चुंबकीय आवेश ग्रहण करती है, चंद्र, शीतल और शुद्ध गुण प्राप्त करती है। ऊर्जा मानसिक, अंतर्मुखी है और व्यावहारिक कार्यों में रुचि नहीं रखती है, बल्कि सहज और गहन है, यह शरीर के बाईं ओर और मस्तिष्क के दाहिने हिस्से से जुड़ी हुई है। यह मानसिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है और पैरासिम्पेथेटिक तंत्रिका तंत्र से जुड़ा होता है।
      2. पिंगला – सूर्यनाड़ी, शरीर के दाहिनी ओर से चढ़ता है, पहले छह चक्रों को छूता है और दाहिनी नासिका में समाप्त होता है। प्राण ऊर्जा एक सकारात्मक चुंबकीय आवेश ग्रहण करती है, सौर, शुष्कन और गर्म गुणों को प्राप्त करती है।ऊर्जा सक्रिय, गतिशील, मजबूत, बहिर्मुखी है, शरीर के दाहिने हिस्से और मस्तिष्क के बाएं हिस्से से जुड़ी हुई है। यह वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक विश्लेषण का पक्षधर है, लेकिन इसमें अंतर्ज्ञान बहुत कम है। यह जीवन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है और सहानुभूति तंत्रिका तंत्र से जुड़ा होता है।
      3. सुषुम्ना- मुख्यनाड़ी, सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक चैनल है, जो रीढ़ की हड्डी के स्तंभ पर स्थित है और इसलिए केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से जुड़ा हुआ है। सुषुम्ना योग और समस्त विकास का मुख्य माध्यम है क्योंकि यह हममें से प्रत्येक में मौजूद क्षमता के जागरण और परिवर्तन की अनुमति देता है; वास्तव में, यह आध्यात्मिक चेतना के जागरण को नियंत्रित करता है। इसके पथ पर विकासवादी चक्र हैं और इसके आधार पर सुप्त कुंडलिनी स्थित है , संभावित ऊर्जा जिसे आध्यात्मिक अभ्यास की आंतरिक आग से जागृत किया जाना चाहिए। जागृत ऊर्जा सिर से परे उठती है, ब्रह्मरंद्र में समाप्त होती है – ब्रह्म का प्रवेश द्वार, सिर के शीर्ष पर स्थित ( सहस्रार चक्र ), सर्वोच्च अनुभूति का रहस्यमय केंद्र। इस नाड़ी का पूर्ण सक्रियण कुंडलिनी जागरण, चक्रों के खुलने और इड़ा और पिंगला के संतुलन से संबंधित है।
  5. प्रत्याहार (इंद्रियों को वापस लेना)

    • इंद्रियों के प्रकार
      • 5 इंद्रियाँ है आँख, नाक, कान, जीभ और स्पर्श। इंद्रियों के माध्यम से हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं तो इच्छाएँ और बलवान होने लगती है क्योंकि असलियत में इच्छा हमारा मन ही करता है। असल में इंद्रियाँ बाहरी नॉलेज का माध्यम होती है जिसके द्वारा हम सुरक्षा और सुविधा से जी सके लेकिन व्यक्ति जब उक्त पाँचों इंद्रियों का दुरुपयोग करना शुरू करता है तो संपूर्ण उर्जा बाहर की ओर बहने लगती है और बार-बार ऐसा करने से शरीर और मस्तिष्क का क्षरण होता रहता है। उर्जा के बाहरी गमन को रोककर उसे भीतर की ओर मोड़ देना ही प्रत्याहर कहलाता है। सर्वप्रथम मन को साधना होता है क्योंकि ये इंद्रियाँ मन की इच्छा-वासनाएँ पूरी करते-करते कमजोर हो जाती हैं। प्रत्याहार में हम इंद्रियों के स्वामी बनने का प्रयास करते हैं। फिलहाल तो मन और इंदियाँ हमें चलाते हैं, फिर जब हम इसे साधते हैं तो इंद्रियाँ और मन के स्वामी बनकर हम इन्हें चलाते हैं।क्या है वासनाएँ : काम, क्रोध, लोभ, मोह यह तो मोटे-मोटे नाम हैं, लेकिन व्यक्ति उन कई बाहरी बातों में रत रहता है जो आज के आधुनिक समाज की उपज हैं जैसे शराबखोरी, सिनेमाई दर्शन और चार्चाएँ, अत्यधिक शोरपूर्ण संगीत, अति भोजन जिसमें माँस भक्षण के प्रति आसक्ति, महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ और ऐसी अनेक बातें जिससे क‍ि पाँचों इंद्रियों पर अधिक भार पड़ता है और अंतत: वह समयपूर्व निढाल हो बीमारियों की चपेट में आ जाती है।

        बाहरी गमन के नुकसान : आँख रूप को, नाक गंध को, जीभ स्वाद को, कान शब्द को और त्वचा स्पर्श को भोगती है। भोगने की इस वृत्ति की जब अति होती है तो इस सबसे मन में विकार की वृद्धि होती है। ये भोग जैसे-जैसे बढ़ते हैं, इंद्रियाँ सक्रिय होकर मन को विक्षिप्त करती रहती हैं। मन ज्यादा व्यग्र तथा व्याकुल होने लगता है, जिससे शक्ति का क्षय होता है।

        कैसे साधे प्रत्याहार को : इंद्रियों को भोगों से दूर करने तथा इंद्रियों के रुख को भीतर की ओर मोड़कर स्थिर रखने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्राणायाम के अभ्यास से इंद्रियाँ स्थिर हो जाती हैं। सभी विषय समाप्त हो जाते हैं। अतः प्राणायाम के अभ्यास से प्रत्याहार की स्थिति अपने आप बनने लगती है। दूसरा उपाय है रोज सुबह और शाम पाँच से तीस मिनट का ध्यान। इस सबके बावजूद अदि आपके भीतर संकल्प है तो आप संकल्प मात्र से ही प्रत्याहार की स्थिति में हो सकते हैं। हालाँकि प्रत्याहार को साधने के हठयोग में कई तरीके बताए गए हैं।

        प्रत्याहर के लाभ : यम, नियम, आसन और प्राणायम को साधने से प्रत्याहार स्वत: ही सध जाता है। इसके सधने से व्यक्ति का एनर्जी लेवल बढ़ता है। पवित्रता के कारण ओज में निखार आता है। किसी भी प्रकार के रोग शरीर और मन के पास फटकते तक नहीं हैं। आत्मविश्‍वास और विचार क्षमता बढ़ जाती है, जिससे धारणा सिद्धि में सहयोग मिलता है। खासकर यह अनंत में छलाँग लगाने के लिए स्वयं के तैयार होने की स्थिति है।

      • योनि मुद्रा :
        1. कान – अंगूठा
        2. आँख  – इंडेक्स फिंगर
        3. नाक पर – मिडिल फिंगर
        4. लिप्स के ऊपर  – रिंग फिंगर
        5. लिप्स के नीचे – छोटी  उंगली
    • योग और अन्य प्रैक्टिस
      •  अंतर
      • प्रैक्टिस
      • भावनाएं
      • अनुभव
      • श्वास पर ध्यान
    • भाव के 8 प्रकार
      1. धर्म : जिस समय जो कर्म है
        1. स्थिरआसन
        2. सुबह उठने पर : Frog Pose और वज्रासन
      2. ज्ञान : धर्म को कैसे करना है अथवा निर्णय लेने में सहायता : Balancing आसन
      3. वैराग्य : जो हो गया उसे जाने दें और स्वीकार करें :
        1. Forward आसन
        2. Relax आसन
        3. शवासन
        4. मकरासन
        5. दृढ़आसन
        6. निष्पंदभाव आसन
      4. ऐश्वर्य : Yogic Confidance और  सुख संपदा
        1. Backward आसन
        2. शुद्धि क्रियाएं
      5. अधर्म :
      6. अज्ञान :
      7. अवैराग्य :
      8. अनैश्वर्य :
    • मेरुरज्जु के 4 आसन
      1. वक्रासन 
        1. Standing 
        2. Seating 
        3. Lying Down 1 
        4. Lying Down 2 
      2. यष्टिआसन 
      3. भुजंगासन
    • त्रिगुणात्मक प्रकृति : सत, रज, तम
      1. सतगुण : Balance, शांति, स्थिरता
      2. रजगुण : Action, क्रिया, तनाव, ऊर्जा
      3. तमगुण : Inaction, बंधन, आराम, आलस्य
    • AVAV : आहार विहार आचार विचार
      • आहार
        • गुण
          1. राजसीय आहार :
          2. तमस आहार :
          3. सात्विक आहार : मधुरम स्निग्धम शिवप्रत्यात
        • समय : कम से कम 4 घंटे का अंतराल
        • मात्रा : आधा पेट भोजन, 1 चौथाई छाछ  (दिन), 1 चौथाई छाछ  (सूप), 1 चौथाई खाली
        • उपलब्धता : स्थानीय, मौसमी
      • विहार : मनोरंजन
      • आचार
      • विचार
  6. धारणा (एकाग्रता)

  7. ध्यान (ध्यान)

    • ओंकार :
      • अ : पेट की माँसपेशी पर ध्यान और कंपन  
      • उ : सीने की माँसपेशी पर ध्यान और कंपन  
      • म : मस्तक भौं के बीच ध्यान और कंपन  
    • मंत्र : इसका शाब्दिक अर्थ ‘विचार’ या ‘चिन्तन’ होता है । ‘मंत्रणा’, और ‘मंत्री’ इसी मूल से बने शब्द हैं । मन्त्र भी एक प्रकार की वाणी है, परन्तु साधारण वाक्यों के समान वे हमको बन्धन में नहीं डालते, बल्कि बन्धन से मुक्त करते हैं। मंत्र शब्द संस्कृत के दो शब्दों-मानस (मन) और त्र (उपकरण) से बना है। मंत्र का शाब्दिक अर्थ है “मन के लिए एक उपकरण” और इसे अभ्यासियों को उच्च शक्ति और उनके वास्तविक स्वरूप तक पहुँचने में मदद करने के लिए डिज़ाइन किया गया था।
      • असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय : अर्थात : हे ईश्वर (हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। 
  8. समाधि (अवशोषण)

प्रश्न : अटैक करना , अपने अधिकारों के लिए लड़ना